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9788173152481 - VRINDAVAN LAL VERMA: PRATYAGAT (AMAR-JYOTI)(Hindi) - पुस्तक

VRINDAVAN LAL VERMA (?):

PRATYAGAT (AMAR-JYOTI)(Hindi) (2011) (?)

डिलीवरी से: भारतयह एक किताबचा पुस्तक हैनई किताब
ISBN:

9788173152481 (?) या 8173152489

, अज्ञात भाषा, Prabhat Prakashan, किताबचा, नई
शिपिंग लागत के लिए: IND
Prabhat Prakashan, 2011. Paperback. New. Printed Pages:228
डेटा से 06.03.2017 01:00h
ISBN (वैकल्पिक notations): 81-7315-248-9, 978-81-7315-248-1
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9788173152481 - VRINDAVAN LAL VERMA: PRATYAGAT (AMAR-JYOTI)(Hindi) - पुस्तक

VRINDAVAN LAL VERMA (?):

PRATYAGAT (AMAR-JYOTI)(Hindi) (2011) (?)

डिलीवरी से: संयुक्त राज्य अमेरिकायह एक किताबचा पुस्तक हैनई किताब
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9788173152481 (?) या 8173152489

, अज्ञात भाषा, Prabhat Prakashan, किताबचा, नई
Printed Pages:228
कीवर्ड: PRATYAGAT (AMAR-JYOTI)VRINDAVAN LAL VERMA9788173152481
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ISBN (वैकल्पिक notations): 81-7315-248-9, 978-81-7315-248-1
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9788173152481 - VRINDAVAN LAL VERMA: PRATYAGAT (AMAR-JYOTI)(Hindi) - पुस्तक

VRINDAVAN LAL VERMA (?):

PRATYAGAT (AMAR-JYOTI)(Hindi) (2011) (?)

डिलीवरी से: संयुक्त राज्य अमेरिकायह एक किताबचा पुस्तक हैनई किताब
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9788173152481 (?) या 8173152489

, अज्ञात भाषा, Prabhat Prakashan, किताबचा, नई
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कीवर्ड: PRATYAGAT (AMAR-JYOTI)VRINDAVAN LAL VERMA9788173152481
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ISBN (वैकल्पिक notations): 81-7315-248-9, 978-81-7315-248-1
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9788173152481 - Vrindavan Lal Verma: (Pratyagat (&Amar -Jyoti) - पुस्तक

Vrindavan Lal Verma (?):

(Pratyagat (&Amar -Jyoti) (2011) (?)

डिलीवरी से: भारतपुस्तक अंग्रेजी भाषा में हैयह पुस्तक एक hardcover पुस्तक एक पुस्तिका नहीं हैनई किताबइस पुस्तक के प्रथम संस्करण
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9788173152481 (?) या 8173152489

, अंग्रेजी में, 228 पृष्ठ, Prabhat Prakashan, hardcover, नई, प्रथम संस्करण
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नवलबिहारी ने वहीं खड़े-खड़े कहा, ' इन पाजी लौंडों की यह हिम्मत! धर्म को गारत किया, अब अपने बडे-बूढ़ों के अपमान पर कमर कसी है ' पंचपात्र छीनने के लिए नवलबिहारी मंगल के पास ऐसे स्थान पर आए जहाँ सोमवती या फूलरानी से उनकी मुठभेड़ नहीं हो सकती थी मंगल से बोले, ' अपना नाश किया था, सो उसका तुमको यह प्रायश्‍च‌ित्त करना पड़ा; अब सारे समाज का नाश करके कौन सा प्रायश्‍च‌ित्त करोगे?' मंगल ने कहा, 'तुम्हारे सरीखे संसार डुबोइयों की अकल अगर मैंने ठीक कर दी तो हमारे समाज का बेड़ा पार है ' एक युवक ने बड़ी बेतकल्लुफी के साथ कहा. ' पंडितजी, क्यों चाँय-चाँय मचाए हुए हो? भाई के हाथ का चरणामृत बँट चुका, अब जरा अपनी बहिन के हाथ का भी पी लेने दो , hardcover, संस्करण: 1, लेबल: Prabhat Prakashan, Prabhat Prakashan, उत्पाद समूह: Book, प्रकाशित: 2011-01-01, स्टूडियो: Prabhat Prakashan, बिक्री रैंक: 814078
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कीवर्ड: Books, Reference
डेटा से 06.03.2017 01:00h
ISBN (वैकल्पिक notations): 81-7315-248-9, 978-81-7315-248-1
9788173152481 - Vrindavan Lal Verma: प्रत्यागत (अमर-ज्योती )(Pratyagat (&Amar -Jyoti) - पुस्तक

Vrindavan Lal Verma (?):

प्रत्यागत (अमर-ज्योती )(Pratyagat (&Amar -Jyoti) (2009) (?)

डिलीवरी से: संयुक्त राज्य अमेरिकायह पुस्तक एक hardcover पुस्तक एक पुस्तिका नहीं हैनई किताब
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9788173152481 (?) या 8173152489

, अज्ञात भाषा, Prabhat Prakashan, hardcover, नई
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नवलबिहारी ने वहीं खड़े-खड़े कहा, ' इन पाजी लौंडों की यह हिम्मत! धर्म को गारत किया, अब अपने बडे-बूढ़ों के अपमान पर कमर कसी है ' पंचपात्र छीनने के लिए नवलबिहारी मंगल के पास ऐसे स्थान पर आए जहाँ सोमवती या फूलरानी से उनकी मुठभेड़ नहीं हो सकती थी मंगल से बोले, ' अपना नाश किया था, सो उसका तुमको यह प्रायश्‍च‌ित्त करना पड़ा; अब सारे समाज का नाश करके कौन सा प्रायश्‍च‌ित्त करोगे?' मंगल ने कहा, 'तुम्हारे सरीखे संसार डुबोइयों की अकल अगर मैंने ठीक कर दी तो हमारे समाज का बेड़ा पार है ' एक युवक ने बड़ी बेतकल्लुफी के साथ कहा. ' पंडितजी, क्यों चाँय-चाँय मचाए हुए हो? भाई के हाथ का चरणामृत बँट चुका, अब जरा अपनी बहिन के हाथ का भी पी लेने दो ' नवलबिहारी की आँखों में खून आ गया उनकी सहज सरल मुसकराहट तो जान पड़ता था मानो दीर्घकाल से लुप्‍त हो गई हो आकृति बहुत भयानक हो उठी । लखपत ने उनको पकड़कर कहा, ' पंडितजी, यहाँ से चलिए । ये लोग बलवा करने के लिए आमादा हैं । मंदिर अपवित्र हो गया है । कल इसको शुद्ध करावेंगे ।, hardcover, Label: Prabhat Prakashan, Prabhat Prakashan, Product group: Book, Published: 2009, Studio: Prabhat Prakashan
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