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9788173151613 - Narendra Mohan: Dharam Aur Sampradayikta(Hindi) - पुस्तक
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Narendra Mohan (?):

Dharam Aur Sampradayikta(Hindi) (2009) (?)

डिलीवरी से: भारतयह एक किताबचा पुस्तक हैनई किताब

ISBN: 9788173151613 (?) या 817315161X, अज्ञात भाषा, Prabhat Prakashan, किताबचा, नई

प्लस शिपिंग, शिपिंग क्षेत्र: INT
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Printed Pages: 166. Paperback
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मंच क्रम संख्या Alibris.co.uk: 13696605862
कीवर्ड: DHARAM AUR SAMPRADAYIKTANARENDRA MOHAN9788173151613
डेटा से 06.03.2017 01:01h
ISBN (वैकल्पिक notations): 81-7315-161-X, 978-81-7315-161-3
9788173151613 - Narendra Mohan: Dharam Aur Sampradayikta - पुस्तक
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Narendra Mohan (?):

Dharam Aur Sampradayikta (?)

डिलीवरी से: भारतनई किताब

ISBN: 9788173151613 (?) या 817315161X, अज्ञात भाषा, Prabhat Prakashan, नई

प्लस शिपिंग, शिपिंग क्षेत्र: INT
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मंच क्रम संख्या Alibris.co.uk: 13389611720
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ISBN (वैकल्पिक notations): 81-7315-161-X, 978-81-7315-161-3
9788173151613 - NARENDRA MOHAN: DHARAM AUR SAMPRADAYIKTA - पुस्तक
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NARENDRA MOHAN (?):

DHARAM AUR SAMPRADAYIKTA (?)

डिलीवरी से: भारतनई किताब

ISBN: 9788173151613 (?) या 817315161X, अज्ञात भाषा, नई

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Hard Bound . New. Year of publication 817315161X
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9788173151613 - NARENDRA MOHAN: DHARAM AUR SAMPRADAYIKTA(Hindi) - पुस्तक
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NARENDRA MOHAN (?):

DHARAM AUR SAMPRADAYIKTA(Hindi) (2009) (?)

डिलीवरी से: भारतयह एक किताबचा पुस्तक हैनई किताब

ISBN: 9788173151613 (?) या 817315161X, अज्ञात भाषा, Prabhat Prakashan, किताबचा, नई

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Prabhat Prakashan, 2009. Paperback. New. Printed Pages:166
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ISBN (वैकल्पिक notations): 81-7315-161-X, 978-81-7315-161-3
9788173151613 - Narendra Mohan: Dharam Aur Sampradayikta - पुस्तक
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Narendra Mohan (?):

Dharam Aur Sampradayikta (2009) (?)

डिलीवरी से: भारतपुस्तक अंग्रेजी भाषा में हैयह पुस्तक एक hardcover पुस्तक एक पुस्तिका नहीं हैनई किताबइस पुस्तक के प्रथम संस्करण

ISBN: 9788173151613 (?) या 817315161X, अंग्रेजी में, 166 पृष्ठ, Prabhat Prakashan, hardcover, नई, प्रथम संस्करण

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धर्म की इस विकृति व भ्रांति के साथ स्वार्थ व अहंकार इतना अधिक जुड़ गए है कि सामान्य व्यक्‍ति धर्म की वास्‍तविक अवधारणा को भूलकर इस विभाजित चेतना को ही सत्‍य मानने लगा है। विभाजित व स्वार्थ प्रधान चेतना से उपजे जो वि‌भ‌िन्‍न धर्म हैं उनमे से अनेक केवल अपने अहंकार, स्थार्थ व आक्रामकता के काराण ही फल-फूल रहे हैं। धर्म का आवरण लेकर अपनाई गई यह आक्रामकता ही ' सांप्रदायिकता' है। इस आक्रामकता को कहीं राजनीतिक कारणों से अपनाया गया और कहीं आर्थिक कारणों से तो कहीं सामाजिक कारणों से। आज स्थिति इतनी बिगड़ी हुई है कि अपना- अपना तथाकथित धार्मिक दर्शन थोपने के लिए धनबल, छलबल व बाहुबल का खुलकर प्रयोग हो रहा है और वह भी सभ्यता व संस्कृति के नाम पर धर्म का लक्ष्य है भेदजनित भ्रांति व अज्ञान का निवारण। लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि यह निवारण भी वैयक्‍तिक स्तर पर ही अनुभूति के माध्यम से करना होगा । इस दृष्‍टि से भेद की सत्ता के अस्तित्व को जगत् के स्तर पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता। जैसेकि महासागर में लहर के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता, वैसे ही विराट‍् चैतन्य के महासागर में भेद रूपी लहर को स्वीकार करना ही होगा; पर ध्यान रहे कि वास्तविक अस्तित्व लहर का नहीं है वरन् महासागर का है। प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने जीवन के सभी पक्षों को लेकर समाज, धर्म, देश आदि अनेक विषयों पर अपने भावों को व्यक्‍त किया है।, hardcover, संस्करण: 1, लेबल: Prabhat Prakashan, Prabhat Prakashan, उत्पाद समूह: Book, प्रकाशित: 2009-01-01, स्टूडियो: Prabhat Prakashan, बिक्री रैंक: 410554
मंच क्रम संख्या Amazon.in: Lh3Oh%2B3hnomNgVYvGQ8ymrC1s%2F ni38Vb4aecBsKd%2BNvysx%2FK%2F9 oiFW2FN0Knrdh2L6YATBCJOthk%2B3 dXQ%2Bg5efd%2Fk%2B3hOgy%2FKdrD 2B%2BOiYJXQkNmiNfWE2Wo7AqFmlZt QoArbmUprE8AzXbIvVRoTlo2ujJrxU 7q
कीवर्ड: Books, Reference
डेटा से 06.03.2017 01:01h
ISBN (वैकल्पिक notations): 81-7315-161-X, 978-81-7315-161-3

9788173151613

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